खिड़की पर इक लड़की रहती थी
by Laxmi Shankar Mishra उसे पता था आज वहां उसकी आखिरी रात है। कुल मिलाकर उसके पास अब सिर्फ 10 घंटे ही शेष बचे थे। हाथ में चाय की प्याली लिए वह फिर बालकनी में आ गया। नजरें फिर उसी खिड़की पर जा टिकीं। 10 दिन से हर रोज उसका ज्यादा वक्त बालकनी में उसी खिड़की को तकते बीता है। उसे याद आया कि 10 रोज पहले जब वह यहां आया था, तो अचानक खिड़की पर यूं ही वह खूबसूरत चेहरा दिख गया था। अभी तो वह सामान भी ठीक से नहीं रख पाया था। पिट्ठू बैग तो पीछे पीठ पर ही लदा था। दो दिन सफर से शरीर बेहाल था। स्टेशन पर उतरा तो सोचा था कि जाकर भरपूर नींद लेगा। पर, यहां तो नींद मानो जैसे गायब सी हो गई थी और शरीर दर्द जैसे छू मंतर। कोई जादू सा था ..खिड़की पर खड़ी उस लड़की में...। वह एकटक खड़ा उसे निहारता रहा था और अचानक दोनों की नजरें लड़ गई थीं। शायद अभी वह नहाकर अपने कमरे में आई थी। उसके गीले बालों से कुछ बूंदें गालों तक टपक कर आ रही थीं। कुछ लटें गालों पर चिपकी हुई थीं और उसने टावेल को हाथ में पकड़ रखा था। नजरें मिलीं थीं तो वो थोड़ा सकपकाई थी। बिस्तर पर पड़े दु...